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    मैं कोई इतिहासकार नही हूँ लेकिन समय के साथ आप सभी से सीखने का प्रयास करते हुए अपने अनुभव प्रेषित कर रहा हूँ।
    दुनिया में मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ मानवीय विकृतियों का जन्म भी हुआ तथा मनाव विचार शीलता का भी सृजन हुआ,विचारशीलता के द्वारा सकारात्मक/नकारात्मक दोनों ही शक्तियों ने मानवीय प्रवृत्ति में स्थाई रूप धारण कर लिया।
    मानवीय सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के साथ साथ बंश परम्परा,राज्य परम्परा, एक दूसरे पर आधिपत्य की परम्परा ने स्थाई स्वरूप ले लिया, राज्य परम्परा ने
    शासक एवम शासित की व्यवस्था के तहत "देव एवम दानव" परम्परा को आगे बढ़ाया ,इस व्यवस्था/परम्पराओं में कोई व्यक्ति विशेष का महत्व नहीं।इतिहास के समयचक्र में सामाजिक सहयोग से तमाम "नायक" स्थापित हुए, उनके ही नाम से विचारवाद स्थापित हुए।

    सर्वश्रेष्ठ समाजवादी महानायक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नकारात्मक विचार को बदलने( देव एवम दानव को एक समान मनाने)मानवीय समानता एवम धर्म/सामाजिक न्याय की अवधारणा को स्थापित करने के लिए तमाम(देवताओं के नायक इंद्र को पराजित कर इस परम्परा का प्रतिकार किया) तथा पांडवों को सिर्फ पांच गांव मांगे वो भी न देने पर,अधिकार/ न्याय के लिए महाभारत जैसे युद्ध/ संघर्ष किये उन संघर्षों में वह अकेले नहीं थे, लेकिन उस व्यवस्था(विचार) को गीता जैसे
    मूलग्रंथ की रचना करने में युगपुरुष स्थापित हुए।( इस ग्रंथ में वाद में मनुवादियों ने कुछ अंश बदलकर अपने अनुकूल बनाने का प्रयास किया गया है)दुनिया मे यह विचार/गीता मानवतावादी (समता, ज्ञान,कर्म प्रधान)अवधारणा की उच्च कोटि की व्यवस्था कायम करने में सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ सिद्ध हुआहै।

    समय अंतराल के बाद देश में तमाम समाज सुधारक नायकों ने अपने सहयोगियों के योगदान से मानवतावादी विचारो के प्रभाव को साम्प्रदाय/धार्मिक शैली की स्थापना में भी तमाम धार्मिक ग्रंथों (कुछ मनुवादी धार्मिक ग्रंथों को छोड़ कर)की रचना मानवता के अनुकूल की गयी है।उनके नायक स्पष्ट है।

    देश/समाज की संचालन व्यवस्था के नाम पर बडी कुटिलता से समाज को जातियों एवम वर्ण में बाटना, भी एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा थी ,देव एवम दानव की व्यवस्था का सुधरा हुआ रूप है ,जो समाज को ऊँच नीच पर आधारित हजारों जातियों में विभाजित कर वर्णीय(ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शुद्र,अवर्ण) व्यवस्था स्थापित की गयी, सभी के जातीय एवम वर्ण के आधार पर कार्य/अधिकार/न्याय/सम्मान सुनिश्चित करने के लिए, लिखित संविधान/ग्रंथ "मनुस्मृति"की स्थापना की गई ,जिसमें बहुत सारे लोगों का योगदान रहा होगा, लेकिन "मनु" नाम के ब्राह्मण का योगदान मुख्य होने के कारण "मनुस्मृति" के नाम से "मनुवादी" विचारधारा को जाना जाता है।

    सवर्णों के हित संरक्षित हेतु लिखित संविधान "मनुस्मृति" के नाम से स्थापित हुआ।
    आज भी प्रत्येक सवर्ण बिना किसी कुतर्क/गतिरोध के अपने मन ,वचन,एवम कर्म में "मनुस्मृति" को स्थापित करने के लिये कृति संकल्पित है।
    आज देश की बहुसंख्यक आबादी उसी सवर्णवाद की पोषक "मनुवाद"की अमानवीयता व्यवस्था के शिकार से (पीड़ित)हैं/रही है।

    इसी "मनुवाद" के चलते हमारा देश हजारों वर्षों तक विदेशी शासकों के अधीन गुलाम रहा, इस मनुवाद ने उन सभी शासकों के साथ मिलकर मनुवादी व्यवस्था को कायम रखा है।जब मनुवाद का जहर विदेशी शासकों के गले उतरना बंद हुआ,तो देश में आजादी के नाम से बिगुल बजाया गया।
    इसी बिगुल के बीच देश में ऊँच नीच के शिकार,सामाजिक, शैक्षिक,संसाधनों से हीन तमाम पिछड़ी/दलित जातियों के महापुरुषों ने देश की बहुसंख्यक आबादी को समान शिक्षा, समान अधिकारों के पक्ष में तथा मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ अपने अपने प्रयास जारी किए ,देश मे आजादी के करीब आते आते यह व्यवस्था/विचार, दलित/अम्बेडकरवाद में बदल गया ,इस आंदोलन में सैकड़ों वर्षों पूर्व से पिछड़े वर्ग के तामम समाज सुधारक/महापुरुषों के संघर्ष को दलितवाद के नायक के रूप में पहचान नहीं मिल सकी, देश जब आजाद हुआ तो , दलितों को आबादी के अनुसार देश के संसाधनों एवम संचालन में पूर्ण अधिकार के साथ संविधान में स्थान दिया गया, देश की सवर्णवादी व्यवस्था के नायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी, राष्ट्रपति मा राजेन्द्र प्रसाद जी, पूर्व प्रधान मंत्री मा जवाहर लाल नेहरू जी, गृहमंत्री मा सरदार वल्लभ भाई पटेल जीआदि (यह सभी राष्ट्रीय सत्ता के केन्द्र थे) का योगदान रहा, इन सभी की इच्छा के विपरीत sc ,st को भी समान अधिकार मिलना संभव नहीं थे,वहां भी ओबीसी के साथ विश्वासघात हुआ, वहां ओबीसी को संवैधानिक व्यवस्था में कोई न्याय/अधिकार प्राप्त नहीं हो सकें।
    sc st को मिले अधिकारों का पूरा श्येय डॉ भीमराव अंबेडकर साहव को मिला, इसके बाद देश में दलितों की विचारधारा का विस्तार
    "अम्बेडकरवाद" के रूप खूब फलफूल रहा है ।
    आज इस विचारधारा का विरोध करने की शक्ति किसी भी दल/सत्ता में नहीं है ,यही अम्बेडकरवादी विचारधारा का असली स्वरूपहै।
    अम्बेडकरवादियों / मनुवादियों ने "पिछड़े वर्ग" के महापुरुष /समाज सुधारक को खूब प्रयोग किया है ,लेकिन उन्हें नायक के रूप कभी स्वीकार नहीं किया,
    यह अम्बेडकरवाद/मनुवादियों की कटु सच्चाई है।

    आजादी के बाद वर्णीय व्यवस्था के स्थान को संविधान के दायरे में वर्गीय व्यवस्था ने ले लिया है। (सवर्ण, पिछडा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति) हम "सेवा"इस सच्चाई को जानते हुए भी सहमत हैं कि अगर किसी "वर्ग" विशेष को संगठित एवम संरक्षित रखना हो तो निर्विवाद रूप से उसी वर्ग के महापुरुष को नायक स्वीकार कर ही आगे की सामाजिक न्याय,
    सामाजिक परिवर्तन,विकास की कठिन यात्राओं को सफलता पूर्वक तय किया जा सकता है।

    अवसरवादी/किराये के नायक बहुत लम्बी यात्रा तय नहीं करा सकते हैं।
    आज ओबीसी के अनेकों महापुरुषों के विखंडित प्रयासो से राज्यों में40/50वर्षो एवम राष्ट्रीय स्तर पर30वर्ष पूर्व 3743 पिछड़े वर्ग उपजातियों को पिछड़ा वर्ग/पिछड़ी जाति को संवैधानिक मान्यता मिलने के बाद भी उसकी दुर्दशा के पीछे भी अवसरवादी/किराये के नायकों की राजनैतिक अवसरवादिता के कारण विखंडित/नेतृत्व विहीन वर्ग बन कर रह गया है। ओबीसी ने भिन्न भिन्न अवसरवादी नायकों को अपना नेतृत्व प्रदान किया है, निःसन्देश कुछ सवर्ण (मा राममनोहर लोहिया, मा जयप्रकाश नारायण, पूर्व प्रधानमंत्री मा वी पी सिंह आदि)नायकों ने ओबीसी के लिए न्याय की आवाज, ओबीसी के छोटे छोटे नायकों का सृजन,तथा ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने की व्यवस्था मैं अहम भूमिका निभाई है।लेकिन यह सब के बाद भी यह सब ओबीसी के नायक बनने लायक नहीं, क्योंकि इनकी मूलधारणा में ओबीसी को लाभ पहुचाना था ही नहीं ,ओबीसी (देश की60%आबादी देश का सबसे बड़ा वोट बैंक है)पक्ष में किये गये कृति राजनैतिक मजबूरी/ राजनैतिक अवसरवादिता थीं ।

    "मा वी पी सिंह" जी का ओबीसी आरक्षण/मंडल कमीशन रिपोर्ट के कुछ अंश को लागू करने के प्रयास के लिए ओबीसी उनका हमेशा कृतिघ्य रहेगा।

    ओबीसी आरक्षण की बात होगी तो निश्चित ही पूर्व प्रधानमंत्री मा वी पी सिंह जी एवम मा शरद यादव जी, मा लालू प्रसाद यादव जी,मा रामविलास पासवान जी अन्य सभी सहयोगी का नाम सम्मान के साथ हमेशा याद किया जायेगा।
    उसी क्रम पूर्व प्रधानमंत्री मा मनमोहन सिंह जी / मा अर्जुन सिंह जी जिन्होंने2006/2007 उच्च शिक्षा तथा प्रधानमंत्री मा नरेंद्र मोदी जी एवम उनके सहयोगियों का 2018में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना तथा2020में केंद्रीय एवम नवोदय विद्यालयो में ओबीसी आरक्षण देने के लिए याद किया जायेगा।

    ओबीसी के पक्ष में आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद भी ओबीसी को देश के संशाधनों/संचालन में पूर्ण प्रतिनिधित्व प्राप्त न होना कहीं न कहीं पूर्व में की गयी संवैधानिक व्यवस्था(सवर्णवादी) पर प्रश्नचिन्ह लगाता है?उसके पीछे सिर्फ एक ही कारण ओबीसी की कोई विचारधारा एवम प्रभावशाली नायक का न होना है।
    जब देश में संवैधानिक वर्गीय व्यवस्था के आधार पर विचारधाराओं के माध्यम से देश के संसाधनों/संचालन में भागीदारी/अवैद्य रूप कब्जेदारी जारी है,
    तो ऐसी स्थिति में पिछड़े वर्ग की विचारधारा सृजन अनिवार्य हो चला है।
    पिछले कुछ वर्षों से "सेवा" ने तय किया है ओबीसी "मंडलवाद" की विचारधारा से ही संगठित/संघर्ष शील/विकसित हो सकता है ,जिसके सिर्फ "बी पी मंडल" ही नायक है,उनके आप पास ओबीसी के / अन्य महापुरुषों की श्रृंखला रहेगीं ,उनको पूरा सम्मान दिया जायेगा।मंडलवाद के महानायक बी पी मंडल साहव ने पिछडों वर्ग के पक्ष में निष्पक्षता, भयमुक्त, दृढ़ संकल्प के साथ, बिना किसी राजनैतिक अवसरवादिता के जीवन के अंतिम समय तक देश की बहुसंख्यक आबादी(बिभिन्न साम्प्रदाय/पंथ/जाति/उपजाति विहीन3743उपजातियों को निष्पक्ष रूप से एक शब्द "पिछड़ी जाति"शीर्षक से मंडल कमीशन रिपोर्ट के रूप में महान ग्रंथ की स्थापना की है)तथा उसे लागू कराने का जीवन के अंतिम क्षण तक भरकस प्रयास किया जो हमेशा अनुकरणीय रहेगा।
    पिछड़ी जाति/पिछड़े वर्ग के लिए "मंडल कमीशन रिपोर्ट" "गीता रूपी ग्रंथ" के रूप में सर्वदा हम/"सेवा" का मार्गदर्शन करने की साक्षी होगी।

    पिछड़े वर्ग की "गीता" "मंडल कमीशन रिपोर्ट"के नायक "बी पी मंडल साहब" ही पिछड़े वर्ग की विचारधारा "मंडलवाद" के महानायक है।"मंडलवाद" में उनकी "समानता" किसी भी अन्य नायक से नहीं की जा सकती है।
    निःसन्देश "मंडलवाद" का ध्वजवाहक होने में "सेवा" ही अग्रणी भूमिका में है। "सेवा" अपने निष्पक्ष, दृढ़ संकल्प के साथ मन, वचन, कर्म की पूर्ण सामर्थ्य से ओबीसी की "मंडलवादी" विचारधारा को स्थापित करने में पूर्ण समर्पण के साथ समर्पित रहेगें।
    "सेवा" हमेशा पिछड़े वर्ग की "सेवार्थ धर्म" निभाने के लिए तत्पर रहेंगी।
    "मंडलवाद" की स्थापना से ही "पिछड़े वर्ग" का कल्याण सम्भव है।
    धन्यवाद
    जय मंडल जय सेवा
    डॉ एम आर यादव रा अध्यक्ष सेवा