SEWA NEWS -
1-
जय मंडल जय सेवा जय भारत।
पुनः दुतीय स्मरण/पढ़ने योग्य विषय
21/4/2020
सम्मानित बंधुओं
सादर प्रणाम
विषय लम्बा है ,किन्तु अतिमहत्वपूर्ण आज आपके पास समय है उस समय को व्यर्थ न जाने दे ,उसी समय से कुछ समय "सेवा" के लिये निकाल कर अवश्य पढ़ें,पढ़ने के बाद लेख की समीक्षा करें ,तथा मुझे और कुछ अच्छा करके लिये सुझाव भी दे ,, जिससे पता चले कि विषय विस्तार से पढ़ा गया,पढ़ने के बाद आप चिंतन करें, मंडलवादी अवधारणा को स्थापित करने हेतु लोंगो के लिये लिखे भी ,इस लेख को अपने "सेवा" के साथियों/ परिवार/रिस्तेदारों/ ओबीसी मित्रों को भेजे ,उनकी प्रतिक्रिया भी जाने और मंडलवादी अवधारणा को स्थापित करने में उनको प्रेरित करें।
विषय:-"साम्राज्यवाद"/"निजीकरण" व्यवस्था "ओबीसी" के मानवीय/संवैधानिक अधिकार प्राप्ति में मुख्य अवरोधक?
मंडल कमीशन की सिर्फ 2 सिफारिशें लागू हुईं ,लेकिन उन्हें भी लागू करने में आना कानी कर निष्प्रभावी करने में "साम्राज्यवाद/निजीकरण" सबसे बड़ा सडयंत्र ?
जानिए बाकी के बारे में।
मंडल कमीशन यानी द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग की ज्यादातर सिफारिशें अभी भी धूल फांक रही हैं। इस पर चर्चा करने को कोई तैयार नहीं है,कि समाज के वंचित तबके के उत्थान के लिए की गई संस्तुतियां अब तक लागू क्यों नहीं कराई जा सकीं । कमीशन ने ‘पूरी योजना’ लागू करने के 20 साल बाद इसकी समीक्षा करने की भी सिफारिश की थी।आरक्षण की समीक्षा करने की बात तो अक्सर कोई न कोई छेड़ देता है।
आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत भी 2015 में आरक्षण की समीक्षा करने की बात कर चुके हैं।
हम भी(सेवा)समीक्षा की मांग करते है।
समीक्षा किस बात की चाहिए ?
1-मा बी पी सिंह की सरकार द्वारा 1990 में ओबीसी के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू की ,तब तक देश में शिक्षा एवम रोजगार में निजीकरण नहीं था। आरक्षण लागू होने के बाद/सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पूर्व कांग्रेस सरकार द्वारा देश मे निजीकरण लागू क्यों किया गया ?
2-"निजीकरण"/"साम्राज्यवादी" व्यवस्था किसी भी देश/ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कलंक है, यह व्यवस्था मानव जीवन को कलंकित करती है,मानवीय संपूर्ण विकास के लिए "महामारी" जैसी बीमारी से भी ज्यादा घातक है ।
बर्तमान में उदाहरण के रूप में संपूर्ण विश्वव्यापी बीमारी "कोरोना"पूरी दुनिया में फैला है ,उसके पीछे भी साम्राज्यवाद/निजीकरण की भावना प्रभावी है?
इसके इलाज में भी सबसे ज्यादा निजीकरण बाधक है। देश में कुल स्वास्थ्य सेवाओं विकसित है ,उसका30%हिस्सा राजकीय क्षेत्र में है ,तथा70%हिस्सा निजीकरण की व्यवस्था से निजी हाथों है ,कोरोना जैसी घातक बीमारी से देश में 30% राजकीय क्षेत्र चिकित्सा सेवाएं(बीमारी से पूर्व जनता की निगाह में नकारा) अपने निम्न एवम सीमित संसाधनों से देश को बचाने में पूरी जान जोखिम में डाल कर दिन रात कार्यरत मानवीय जीवन को बचाने में जुटी है।
वही जनता की विश्वासपात्र 70% निजी चिकित्सा व्यवस्थाये(निजी मेडिकल कालेज /अस्पताल/क्लीनिक) "माटी के माधव" के रूप अपने कपाट बंद किये बैठे हैं ,इसी तरह आर्थिक रूप निजीकरण की व्यवस्था देश को गर्त में ले जा रही है, यह किसी से छिपा नहीं है?
सरकारी सेवायें चाहे स्वास्थ्य सेवाएं/प्रशासनिक अधिकारी/कर्मचारी/सुरक्षा कर्मियों /सफाई कर्मी/अन्य सरकारी सेवाओं में लगें तमाम तरह के लोग सेवायें दे रहे हैं वह देश में मानवीय जीवन को बचाने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाये है।
निजीकरण व्यवस्था किसी भी स्वरूप में मानव जीवन को बचाने योग्य नहीं, अपवाद स्वरूप कहीं संभव हो?
इसी तरह देश की 60%आबादी सामाजिक एवम शैक्षिक रूप से पिछडा/बंचित समाज(ओबीसी) को तबाह करने के मकसद से/ओबीसी को आरक्षण से मुक्ति हेतु देश के (शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार ,उधोग आदि) संसाधनो में "साम्राज्यवादी" व्यवस्था के तहत "निजीकरण" करके ओबीसी को उसके संवैधानिक अधिकार से बंचित करने की व्यवस्था है, जहां निजीकरण संभव नहीं हो सका(सेना, शोध/तकनीक, न्यायालय,एलक पद के नाम, आदि) वहाँ वहाँ देश (राष्ट्रीयता/फर्जी देश भक्ति)का वास्ता देकर आरक्षण से मुक्त रखा गया।
यह आप के साथ अन्याय नहीं तो क्या है?
इसकी समीक्षा होनी चाहिए या नहीं?
यह आपके सोचने एवम समझने या जागरूक होने का विषय है या नही?
यह देश/पिछड़े वर्ग के सामने लाने का विषय है या नहीं?
इस विषय को देश/समाज के सामने कौन लायेगा ?
तय आपको करना है या किसी अन्य?
3-देश के संविधान में आरक्षण की अवधारणा सामाजिक एवम के शैक्षिक है उसमें संविधान के विपरीत ओबीसी आरक्षण में क्रीमीलेयर (आर्थिक) का प्रावधान क्यों जोड़ा गया?
4-ओबीसी आरक्षण एवम सामाजिक संरक्षण के लिए ओबीसी आयोग बनाया गया तो संविधान में परिवर्तन कर उसके संवैधानिक/न्यायिक अधिकार सीज कर अनुसूचित जाति आयोग को क्यों दिये गए?
5-ओबीसी के आरक्षण/सामाजिक संरक्षण हेतु संवैधानिक अधिकार, अनुसूचित जाति आयोग के पास थे,
तो 1993से2018तक ओबीसी आरक्षण एवम सामाजिक अन्याय के खिलाफ ,अनुसूचित जाति आयोग द्वारा कोई कदम क्यों नहीं उठाये गये?
6-बी पी मंडल रिपोर्ट दिसम्बर1980से प्राप्त आंकड़े तथा मा शरद यादव जी द्वारा संसद से प्राप्त दिसम्बर 2012से प्राप्त आंकड़े जो इस प्रकार है :-
मंडल रिपोर्ट1980के आंकड़े ।
क्लास प्रथम में5.69%,
क्लास दुतीय10.63%,
क्लास तृतीय/चतुर्थ 18.98%
मा शरद यादव जी द्वारा 2012में संसद से प्राप्त आंकड़े।
क्लास प्रथम 6.9%
क्लास दुतीय 7.3%
क्लास तृतीय/चतुर्थ 15.3%
दोनों आंकड़ों को देखने से स्पष्ट होता है कि आरक्षण प्राप्त के32वर्षों बाद भी ओबीसी की नौकरियों में संख्या घटी। ओबीसी आरक्षण /सामाजिकता के आधार पर अन्याय हुआ, यह सरासर संवैधानिक/न्यायिक अधिकारों के खिलाफ व्यवस्था द्वारा जघन्य अपराध किया जा रहा था, उसकी समीक्षा क्यो नहीं हुई?
7-मा शरद यादव जी द्वारा संसद से प्राप्त आंकड़े दर्शाते हैं कि आरक्षण लागू होने के बाद ओबीसी की नौकरियों में संख्या गिरी ,तथा ओबीसी जाति जनगणना 1931 के बाद आज तक ओबीसी उपजातियो के आंकड़े देश के पास नही है, तथा आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू होने से कोई ओबीसी की विशेष उपजाति इसका लाभ नही उठा सकती ,तो वर्ष2017में "पिछड़ा वर्ग वर्गीकरण आयोग"का गठन ओबीसी को खण्ड खण्ड करने का सडयंत्र नहीं है तो क्या? ओबीसी को समझने एवम चिंतन/समीक्षा की आवश्यकता नहीं है क्या?
8-यह सर्वविदित है कि ओबीसी की 95% जनसँख्या गांव/ग्रामीण इलाकों में निवास करती है जब तक गाँव/ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के साधन विकसित किये बिना ओबीसी को मुख्यधारा लाना मुश्किल कार्य ही नामुकिन है ।सरकारों द्वारा इसके विपरीत कार्य किये गए, सरकारों द्वारा शहरीकरण का विकास (स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के क्षेत्र में) व उनकी निजीकरण की व्यवस्था को प्रबल बढ़ावा दिया गया।उसके विपरीत ग्रामीण इलाकों (स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वरोजगार) के साधनों को निष्प्रभावी करने में सरकार एवम साम्राज्यवादी व्यवस्था की अहम भूमिका समीक्षा क्यों नहीं होती?
9-मंडल कमीशन की रिपोर्ट पूरी तरह लागू क्यों नहीं हो पायी, उसके पीछे कौन से कारण है?
10-जिस व्यवस्था ने मंडल कमीशन सिफारिशें लागू नहीं होने दिया, उस व्यवस्था में कितना बदलाव हुआ?
11-जो लोग लागू न होने देने में दोषी है, उनके चिंन्हीकरण क्या व्यवस्था की गयी ?
12-चिह्नित दोषी लोगों के खिलाफ दण्ड देने के प्रावधान के लिए क्या देश में कोई कानून बनाया गया है?
13-देश में सबसे बड़ा संविधान के साथ विश्वासघात कर 9,10,11जनवरी2019में असंवैधानिक रूप संविधान परिवर्तन कर 10%सवर्ण आरक्षण लागू करना इसकी समीक्षा कौन करेगा?
इस सब विंदुओं की समीक्षा की आवश्यकता किसको है?
आप तय करें।
अब देश में आप सभी (सेवा) के सार्थक प्रयास से2018से "ओबीसी आयोग"को संवैधानिक/न्यायिक अधिकार प्राप्त हुए हैं, लेकिन आप सभी के मंडलवादी चिंतन के अभाव(सामाजिक' वैचारिक, राजनैतिक निष्क्रियता के कारण)में ओबीसी आयोग से बहुत अधिक उम्मीद करना आयोग के साथ अन्याय है।
इन विंदुओं पर देश में चर्चा/समीक्षा होनी चाहिए,वह नहीं होती?क्योंकि
देश सामन्तवादी/साम्राज्यवादी व्यवस्था ने" मंडल कमीशन" की सिफारिशों को वह जायज नहीं मानती।
जिनके लिए (ओबीसी) यह सिफारिशें की गयी उनके पास आपस लड़ने ,एक दूसरे को नीच एवम नीचा दिखाने, पाखण्ड, अंधभक्ति ,कुरीतियों को परम्परागत बढ़ावा,चापलूसी गणेश परिक्रमा, सामन्तवादी/साम्राज्यवादी व्यवस्था का पोषण तथा अन्य ओबीसी विरोधी विचारों का पोषण आदि से समय कहाँ बचता है? जिससे श्रधेय बी पी मंडल जी द्वारा किये गये व्यवस्था परिवर्तन की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ हो रहे सडयंत्र पर समीक्षा/चिंतन कर सकें।
मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय 13 में कुल 40 प्वाइंट में सिफारिशें की हैं।पहले प्वाइंट में ही कहा गया है कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ापन और गरीबी, जाति आधारित बाधाओं की वजह से है।यह बाधाएं हमारे सामाजिक ढांचे से जुड़ी हुई हैं।इन्हें खत्म करने के लिए ढांचागत बदलाव की जरूरत होगी।देश के शासक वर्ग के लिए ओबीसी की समस्याओं की अनुभूति में बदलाव कम महत्वपूर्ण नहीं होगा।
इस ढांचागत बदलाव के लिए कमीशन ने नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की सिफारिश की।सिफारिश में आयोग ने आरक्षण लागू करने पर गुणवत्ता, ओबीसी की स्थिति में कुछ नौकरियों के चलते बदलाव न होने, मेधावी अभ्यर्थियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ने जैसे तमाम तर्कों का जवाब दिया। आइए कमीशन की सिफारिशों को बिंदुवार देखते हैं, जिन्हें लागू करने को लेकर चर्चा नहीं होती।
1. खुली प्रतिस्पर्धा में मेरिट के आधार पर चुने गए ओबीसी अभ्यर्थियों को उनके लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में समायोजित नहीं किया जाए।
2. ओबीसी आरक्षण सभी स्तरों पर प्रमोशन कोटा में भी लागू किया जाए।
3. संबंधित प्राधिकारियों द्वारा हर श्रेणी के पदों के लिए रोस्टर व्यवस्था उसी तरह से लागू किया जाना चाहिए, जैसा कि एससी और एसटी के अभ्यर्थियों के मामले में है।
4. सरकार से किसी भी तरीके से वित्तीय सहायता पाने वाले निजी क्षेत्र के सभी प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों की भर्ती उपरोक्त तरीके से करने और उनमें आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।
5. इन सिफारिशों को प्रभावी बनाने के लिए यह जरूरी है कि पर्याप्त वैधानिक प्रावधान सरकार की ओर से किए जाएं, जिसमें मौजूदा अधिनियमों, कानूनों, प्रक्रिया आदि में संशोधन शामिल है, जिससे वे इन सिफारिशों के अनुरूप बन जाएं।
6. शैक्षणिक व्यवस्था का स्वरूप चरित्र के हिसाब से अभिजात्य है।इसे बदलने की जरूरत है, जिससे यह पिछड़े वर्ग की जरूरतों के मुताबिक बन सके।
7. अन्य पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने में सुविधा देने के लिए अलग से धन का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिससे अलग से योजना चलाकर गंभीर और जरूरतमंद विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जा सके और उनके लिए उचित माहौल बनाया जा सके।
8. ज्यादातर पिछड़े वर्ग के बच्चों की स्कूल छोड़ने की दर बहुत ज्यादा है। इसे देखते हुए प्रौढ़ शिक्षा के लिए एक गहन एवं समयबद्ध कार्यक्रम शुरू किया जाना चाहिए, जहां ओबीसी की घनी आबादी है। पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों के लिए इन इलाकों में आवासीय विद्यालय खोले जाने चाहिए, जिससे उन्हें गंभीरता से पढ़ने का माहौल मिल सके। इन स्कूलों में रहने खाने जैसी सभी सुविधाएं मुफ्त मुहैया कराई जानी चाहिए, जिससे गरीब और पिछड़े घरों के बच्चे इनकी ओर आकर्षित हो सकें।
9. ओबीसी विद्यार्थियों के लिए अलग से सरकारी हॉस्टलों की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिनमें खाने, रहने की मुफ्त सुविधाएं हों।
10. ओबीसी हमारी शैक्षणिक व्यवस्था की बहुत ज्यादा बर्बादी की दर को वहन नहीं कर सकते, ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि उनकी शिक्षा बहुत ज्यादा व्यावसायिक प्रशिक्षण की ओर झुकी हुई हो। कुल मिलाकर सेवाओं में आरक्षण से शिक्षित ओबीसी का एक बहुत छोटा हिस्सा ही नौकरियों में जा सकता है।शेष को व्यावसायिक कौशल की जरूरत है, जिसका वह फायदा उठा सकें।
11. ओबीसी विद्यार्थियों के लिए सभी वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस में 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की जाए, जो केंद्र व राज्य सरकारें चलाती हैं।
12. आरक्षण से प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों को तकनीकी और प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस में विशेष कोचिंग की सुविधा प्रदान की जाए।
13. गांवों में बर्तन बनाने वालों, तेल निकालने वालों, लोहार, बढ़ई वर्गों के लोगों की उचित संस्थागत वित्तीय व तकनीकी सहायता और व्यावसायिक प्रशिक्षण मुहैया कराई जानी चाहिए, जिससे वे अपने दम पर छोटे उद्योगों की स्थापना कर सकें। इसी तरह की सहायता उन ओबीसी अभ्यर्थियों को भी मुहैया कराई जानी चाहिए, जिन्होंने विशेष व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया है।
14. छोटे और मझोले उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बनी विभिन्न वित्तीय व तकनीकी एजेंसियों का लाभ सिर्फ प्रभावशाली तबके के सदस्य ही उठा पाने में सक्षम हैं।इसे देखते हुए यह बहुत जरूरी है कि पिछड़े वर्ग की वित्तीय व तकनीकी सहायता के लिए अलग वित्तीय संस्थान की व्यवस्था की जाए।
15. पेशेगत समूहों की सहकारी समितियां बनें. इनकी देखभाल करने वाले सभी पदाधिकारी और सदस्य वंशानुगत पेशे से जुड़े लोगों में से हों और बाहरी लोगों को इसमें घुसने और शोषण करने की अनुमति नहीं हो।
16. देश के औद्योगिक और कारोबारी जिंदगी में ओबीसी की हिस्सेदारी नगण्य है।वित्तीय और तकनीकी इंस्टीट्यूशंस का अलग नेटवर्क तैयार किया जाए, जो ओबीसी वर्ग में कारोबारी और औद्योगिक इंटरप्राइजेज को गति देने में सहायक हों।
17. सभी राज्य सरकारों को प्रगतिशील भूमि सुधार कानून लागू करना चाहिए, जिससे देश भर के मौजूदा उत्पादन संबंधों में ढांचागत एवं प्रभावी बदलाव लाया जा सके।
18. इस समय अतिरिक्त भूमि का आवंटन एससी और एसटी को किया जाता है।भूमि सीलिंग कानून आदि लागू किए जाने के बाद से मिली अतिरिक्त जमीनों को ओबीसी भूमिहीन श्रमिकों को भी आवंटित की जानी चाहिए।
19. कुछ पेशेगत समुदाय जैसे मछुआरों, बंजारा, बांसफोड़, खाटवार आदि के कुछ वर्ग अभी भी देश के कुछ हिस्सों में अछूत होने के दंश से पीड़ित हैं. उन्हें आयोग ने ओबीसी के रूप में सूचीबद्ध किया है, लेकिन सरकार द्वारा उन्हें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने पर विचार करना चाहिए।
20. पिछड़ा वर्ग विकास निगमों की स्थापना की जानी चाहिए।यह केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर किया जाना चाहिए, जो पिछड़े वर्ग की उन्नति के लिए विभिन्न सामाजिक-शैक्षणिक और आर्थिक कदम उठा सकें।
21. केंद्र व राज्य स्तर पर पिछड़े वर्ग के लिए एक अलग मंत्रालय/विभाग बनाया जाना चाहिए, जो उनके हितों की रक्षा का काम करे।
22. पूरी योजना को 20 साल के लिए लागू किया जाना चाहिए और उसके बाद इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।
इन सिफारिशों के अलावा मंडल कमीशन ने रिपोर्ट के प्रारंभ में ही कहा था कि जातियों के आंकड़े न होने के कारण उसे काम करने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसलिए अगली जनगणना में जातियों के आंकड़े भी जुटाए जाएं।
आरक्षण का विरोध और मंडल आयोग के तर्क:
आरक्षण लागू किए जाने के विरोध को लेकर भी आयोग सतर्क था।अभी जिन तर्कों के साथ आरक्षण का विरोध किया जाता है, वही सब तर्क शुरुआत से रहे हैं।इन तर्कों पर अपनी सिफारिशों में आयोग ने कहा, ‘निश्चित रूप से यह सही है कि ओबीसी के लिए आरक्षण से तमाम अन्य लोगों का कलेजा दुखेगा।लेकिन क्या इस तकलीफ के कारण हम सामाजिक सुधार के नैतिक दायित्व को छोड़ सकते हैं? जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा था, तब भी तमाम लोग ऐसे थे, जिनका दिल दुखा था। दक्षिण अफ्रीका में जब काले लोग दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो सभी श्वेतों का कलेजा सुलगता है। अगर भारत में उच्च जातियों की 20 प्रतिशत से भी कम आबादी शेष आबादी पर सामाजिक अन्याय करती है तो निश्चित रूप से निचली जातियों का कलेजा सुलगता है। लेकिन अगर निम्न जातियां ताकत और सम्मान के राष्ट्रीय केक में से एक छोटा सा टुकड़ा मांग रही हैं तो यह सत्तासीन वर्ग के लोग यह दलील दे रहे हैं कि इससे असंतोष होगा। पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण के खिलाफ ‘असंतोष’ को लेकर जो तमाम भारी भरकम तर्क आ रहे हैं, वह सरासर कुतर्क हैं.’
आरक्षण का लाभ कुछ जातियों तक सिमट जाने का तर्क मौजूदा समय में एक बड़ा तर्क यह भी दिया जाता है कि कुछ जातियां आरक्षण का पूरा लाभ ले रही हैं।शेष पिछड़ा वर्ग वंचित रह जा रहा है।इस तर्क का जवाब भी मंडल कमीशन ने देते हुए अपनी सिफारिशों में लिखा है, ‘इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि आरक्षण व कल्याणकारी कदमों का ज्यादा लाभ उन लोगों को होगा, जो पिछड़े समाज में ज्यादा आगे हैं। लेकिन क्या यह सार्वभौमिक लक्षण नहीं है? सभी सुधारवादी उपचार पदानुक्रम में धीरे धीरे होते हैं, सामाजिक सुधार में कोई अचानक उभार (क्वांटम जंप) नहीं होता।कमोबेश मानव स्वभाव रहा है कि वर्ग विहीन समाज में भी आखिरकार एक ‘नया वर्ग’ उभरकर सामने आता है।आरक्षण का मूल लाभ यह नहीं है कि ओबीसी में समतावादी समाज उभरकर सामने आएगा, जबकि पूरा भारतीय समाज असमानताओं से भरा पड़ा है। लेकिन आरक्षण से निश्चित रूप से ऊंची जातियों का सेवाओं में कब्जा खत्म होगा।मोटे तौर पर ओबीसी देश के शासन प्रशासन में थोड़ी हिस्सेदारी प्राप्त कर सकेंगे.’
आरक्षण से किसे लाभ हुआ?
इस समय यह बात अक्सर उठती है कि आरक्षण लागू होने पर भी पिछड़े वर्ग को क्या लाभ हुआ।अब तो पिछड़े वर्ग से जुड़े लोग भी कहने लगे हैं कि आरक्षण का कोई लाभ नहीं है।इससे कोई अगड़ापन नहीं आ गया है।यह तर्क भी पुराना है, जिसका जवाब मंडल कमीशन ने अपनी सिफारिश में की है। आयोग ने कहा, ‘हमारा यह दावा कभी नहीं रहा है कि ओबीसी अभ्यर्थियों को कुछ हजार नौकरियां देकर हम देश की कुल आबादी के 52 प्रतिशत पिछड़े वर्ग को अगड़ा बनाने में सक्षम होंगे। लेकिन हम यह निश्चित रूप से मानते हैं कि यह सामाजिक पिछड़ेपन के खिलाफ लड़ाई का जरूरी हिस्सा है, जो पिछड़े लोगों के दिमाग में लड़ी जानी है।भारत में सरकारी नौकरी को हमेशा से प्रतिष्ठा और ताकत का पैमाना माना जाता रहा है।सरकारी सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर हम उन्हें देश के प्रशासन में हिस्सेदारी की तत्काल अनुभूति देंगे।जब एक पिछड़े वर्ग का अभ्यर्थी कलेक्टर या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक होता है तो उसके पद से भौतिक लाभ उसके परिवार के सदस्यों तक सीमित होता है लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर बहुत व्यापक होता है.’
मंडल आयोग पर ईमानदारी से नहीं हुआ अमल:
मंडल आयोग की सिफारिशों को देखें तो इसके सिर्फ दो बिंदुओं लागू करने का निर्णय हुआ था।उसे निष्प्रभावी किया गया।बाकी सिफारिशों पर तो काम भी शुरू नहीं हुआ है। मंडल कमीशन की सिफारिशों पर बेमन से काम करने का परिणाम यह हुआ कि अब तक भारत के शोषणकारी सामाजिक ढांचे में बदलाव नहीं हुआ।
उसके पीछे सिर्फ निम्न कारण प्रतीत होते है ।
1-ओबीसी का प्रगतिशील सामाजिक, वैचारिक, सैद्धांतिक "मंडलवादी" विचार का न होना
2- ओबीसी का सामाजिक ,शैक्षिक, आर्थिक रूप से पिछड़ेपन के कारण विभिन्न सम्प्रदाय एवम उपजातियों में विखंडित स्वरूप ।
3-धार्मिक पाखण्ड,धार्मिकअंधभक्ति,
अंधविश्वास, कुरीतियां आदि की बहुलता।
4-प्रगतिशील विचारों का अभाव तथा सामाजिक, वैचारिक, सैद्धांतिक रूप
रुड़वादी परम्पराओं को अपनी शान समझ कर निभाते रहना। देश मे मुख्य रूप से दो (शासक/शाषित,शोषक/शोषित,मनुवाद/दलित वाद,हिंदूवाद/मूलनिवासीवाद) विचारधारा का पोषण।
5-ओबीसी समाज के सामाजिक एवम राजनैतिक कार्यकर्ताओं/नेतत्वकर्ताओं में समतावादी/ "मंडलवादी" विचारधारा का अभाव।
अगर हम सब देश में बहुसंख्यक आबादी "ओबीसी" को सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनैतिक रूप सशक्त देखना चाहते हो तो।
पूर्व में दिये कारणों के निवारण हेतु आत्मचिंतन, वैचारिक क्रांति की अनिवार्यता के साथ, "निजीकरण"/"साम्राज्यवाद" से मुक्ति हेतु,आजादी से पूर्व या आजादी के बाद के रुड़वादी व्यवस्था,समाज, विचार, सिद्धान्त, शिक्षा को त्याग कर , संगठित ओबीसी,प्रगतिशील व्यवस्था ,प्रगतिशील समाज, प्रगतिशील विचार, प्रगतिशील सिद्धान्त, प्रगतिशील शिक्षा , प्रगतिशील संघर्ष धारण कर, विश्व की सर्वश्रेष्ठ "समतावादी विचारधारा" को धारण कर ”मंडलवादी" व्यवस्था की स्थापित कर ही, लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
जय मंडल जय सेवा
डॉ एम आर यादव रा अध्यक्ष सेवा
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जय मंडल जय सेवा जय भारत।
08/06/2020
सेवा के
समस्त पदाधिकारी/ सम्मानित साथियों
सादर प्रणाम
विषय:"सेवा" की "विचारधारा/सिद्धान्त स्पष्ट है,मानवता एवम राष्ट्र भक्ति से परिपूर्ण "मंडलवाद" के रूप
में "पूर्ण समाजवादी व्यवस्था" की आत्मा को धारण करते हुए ,समय एवम परिस्थितियों के अनुकूल "पिछड़े वर्ग" के लिए समर्पित रहेंगे है।
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व्यक्ति/व्यक्तियो के विचार से एक मिशन का जन्म होता है, मिशन के लिए कोई भी कार्य अंतिम नहीं, सकारात्मक, रचनात्मक कृत को निरन्तर जारी रखने से चरित्र निर्माण की(नैतिकमूल्य,निष्ठा,ईमानदारी,
निष्पक्ष,निःस्वार्थ भावना ,समझ, दृढ़विश्वास,साहस, वफादारी, सभी का सम्मान आदि से मिलकर विकसित व्यक्तित्व से)प्रक्रिया पूर्ण होती है।
चरित्रवान होने के साथ चरित्रवान दिखना भी होगा।
हम सब को अपने चरित्र में दृढ़ संकल्प के साथ ओबीसी (क्षेत्र, धर्म,समाज,जाति ,उपजाति,गोत्र,
परिवार,भाई, भतीजावाद विहीन ) के साथ बिना किसी भेदभाव से परे न्यायिक चरित्र को धारण कर "सेवा" की धारणा(मंडलवादी विचारधारा) के अनुरूप हर तरह से सहयोग/योगदान प्रदान करने का चरित्र एवम विचार हर हालत में विकसित कर दृढ़ संकल्पित होना होगा ।
तभी सैकड़ो वर्षों में साजिश के तहत ओबीसी के विखंडन की प्रक्रिया को खंडित कर पाओगे।
नहीं तो आप सभी का उत्कृष्ट कृत ("सेवा" का निर्माण/सेवा परिधि में दिया गया सामाजिक/शैक्षिक/आर्थिक/न्यायिक/ संवैधानिक योगदान)निष्फलता को प्राप्त होगा।
आप "सेवा"/मंडलवादी समाज/विचारधारा की स्थापना ही पिछड़े वर्ग को सामाजिक/शैक्षिक/संवैधानिक/राजनैतिक न्याय दिलाने में सक्षम होंगी। "मंडलवादी" विचारधारा पूर्णतः मानवता एवम असली राष्ट्र भक्ति से परिपूर्ण, पिछड़े वर्ग के सामाजिक/संवैधानिक अधिकारों की प्राप्ति के खिलाफ किये गये , भ्रामक, धार्मिक/सम्प्रदाय आडम्बर,पाखण्ड, अंधविश्वास, कुरीतियों, अवैज्ञानिकता के अस्तित्व को नकारते हुए ,पूर्ण रूप से वैज्ञानिक अस्तित्व को स्वीकार करते हुए समय, काल ,परिस्थिति के अनुकूल पिछड़े वर्ग के पक्ष में पूर्ण संकल्पित/क्षमता से समर्पित रहेंगे।
सेवा/मंडलवादी विचारधारा "पूर्ण समाजवादी व्यवस्था" की आत्मा को धारण करते हुए ,किसी भी व्यक्ति/समाज/वर्ग/विचारधारा/संगठन/दल से व्यक्तिगत ईर्ष्या/विरोध नहीं है ।
लेकिन अगर कोई व्यक्ति/समाज/वर्ग/विचारधारा/ संगठन/दल,
ईर्ष्या/द्वेष से "सेवा"/मंडलवादी विचारधारा/पिछड़ा वर्ग/पिछड़ी जाति का, व्यक्तिगत/सामाजिक/वैचारिक/संवैधानिक विरोध करेगा, तो "सेवा" अपने सामाजिक/संवैधानिक दायित्व को स्वीकार करते हुए नियमानुसार उसका प्रतिकार अवश्य करेंगी।
धन्यवाद।
जय मंडल जय सेवा
डॉ एम आर यादव रा अध्यक्ष सेवा
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।जय मंडल जय सेवा जय भारत।
22/05/2020
अतिमहत्वपूर्ण/अवश्य पढ़ें एवम आत्मचिंतन करें।
सेवा के सभी सम्मानित साथियों
विषय:-वर्गवादी सामाजिक एवम वैचारिक, अवधारणा का स्वरूप:-
(मनुवाद(सवर्णवाद)
अम्बेडकरवाद(दलितवाद)
मंडलवाद (पिछड़ा वर्गवाद)
यह मेरा निजी राय/व्यक्तिगत अनुभव से लिख रहा हूँ किसी व्यक्ति/समाज/वर्ग/संगठन/दल की भावनाओं को ठेस पहुंचाना मेरा मकसद नहीं ,अगर किसी को मेरे विचार से असहमति हो तो मैं उनका क्षमा प्रार्थी हूँ।
लेकिन अगर इस विचार से सहमत है तो ओबीसी समाज तक पहुँचाने का प्रयास जारी रखें जिससे पिछड़े वर्ग के हित में मंडलवाद स्थापित किये जाने की प्रक्रिया में सहायक सिद्ध हो सकें।
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मैं कोई इतिहासकार नही हूँ लेकिन समय के साथ आप सभी से सीखने का प्रयास करते हुए अपने अनुभव प्रेषित कर रहा हूँ।
दुनिया में मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ मानवीय विकृतियों का जन्म भी हुआ तथा मनाव विचार शीलता का भी सृजन हुआ,विचारशीलता के द्वारा सकारात्मक/नकारात्मक दोनों ही शक्तियों ने मानवीय प्रवृत्ति में स्थाई रूप धारण कर लिया।
मानवीय सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के साथ साथ बंश परम्परा,राज्य परम्परा, एक दूसरे पर आधिपत्य की परम्परा ने स्थाई स्वरूप ले लिया, राज्य परम्परा ने
शासक एवम शासित की व्यवस्था के तहत "देव एवम दानव" परम्परा को आगे बढ़ाया ,इस व्यवस्था/परम्पराओं में कोई व्यक्ति विशेष का महत्व नहीं।इतिहास के समयचक्र में सामाजिक सहयोग से तमाम "नायक" स्थापित हुए, उनके ही नाम से विचारवाद स्थापित हुए।
सर्वश्रेष्ठ समाजवादी महानायक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नकारात्मक विचार को बदलने( देव एवम दानव को एक समान मनाने)मानवीय समानता एवम धर्म/सामाजिक न्याय की अवधारणा को स्थापित करने के लिए तमाम(देवताओं के नायक इंद्र को पराजित कर इस परम्परा का प्रतिकार किया) तथा पांडवों को सिर्फ पांच गांव मांगे वो भी न देने पर,अधिकार/ न्याय के लिए महाभारत जैसे युद्ध/ संघर्ष किये उन संघर्षों में वह अकेले नहीं थे, लेकिन उस व्यवस्था(विचार) को गीता जैसे
मूलग्रंथ की रचना करने में युगपुरुष स्थापित हुए।( इस ग्रंथ में वाद में मनुवादियों ने कुछ अंश बदलकर अपने अनुकूल बनाने का प्रयास किया गया है)दुनिया मे यह विचार/गीता मानवतावादी (समता, ज्ञान,कर्म प्रधान)अवधारणा की उच्च कोटि की व्यवस्था कायम करने में सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ सिद्ध हुआहै।
समय अंतराल के बाद देश में तमाम समाज सुधारक नायकों ने अपने सहयोगियों के योगदान से मानवतावादी विचारो के प्रभाव को साम्प्रदाय/धार्मिक शैली की स्थापना में भी तमाम धार्मिक ग्रंथों (कुछ मनुवादी धार्मिक ग्रंथों को छोड़ कर)की रचना मानवता के अनुकूल की गयी है।उनके नायक स्पष्ट है।
देश/समाज की संचालन व्यवस्था के नाम पर बडी कुटिलता से समाज को जातियों एवम वर्ण में बाटना, भी एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा थी ,देव एवम दानव की व्यवस्था का सुधरा हुआ रूप है ,जो समाज को ऊँच नीच पर आधारित हजारों जातियों में विभाजित कर वर्णीय(ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शुद्र,अवर्ण) व्यवस्था स्थापित की गयी, सभी के जातीय एवम वर्ण के आधार पर कार्य/अधिकार/न्याय/सम्मान सुनिश्चित करने के लिए, लिखित संविधान/ग्रंथ "मनुस्मृति"की स्थापना की गई ,जिसमें बहुत सारे लोगों का योगदान रहा होगा, लेकिन "मनु" नाम के ब्राह्मण का योगदान मुख्य होने के कारण "मनुस्मृति" के नाम से "मनुवादी" विचारधारा को जाना जाता है।
सवर्णों के हित संरक्षित हेतु लिखित संविधान "मनुस्मृति" के नाम से स्थापित हुआ।
आज भी प्रत्येक सवर्ण बिना किसी कुतर्क/गतिरोध के अपने मन ,वचन,एवम कर्म में "मनुस्मृति" को स्थापित करने के लिये कृति संकल्पित है।
आज देश की बहुसंख्यक आबादी उसी सवर्णवाद की पोषक "मनुवाद"की अमानवीयता व्यवस्था के शिकार से (पीड़ित)हैं/रही है।
इसी "मनुवाद" के चलते हमारा देश हजारों वर्षों तक विदेशी शासकों के अधीन गुलाम रहा, इस मनुवाद ने उन सभी शासकों के साथ मिलकर मनुवादी व्यवस्था को कायम रखा है।जब मनुवाद का जहर विदेशी शासकों के गले उतरना बंद हुआ,तो देश में आजादी के नाम से बिगुल बजाया गया।
इसी बिगुल के बीच देश में ऊँच नीच के शिकार,सामाजिक, शैक्षिक,संसाधनों से हीन तमाम पिछड़ी/दलित जातियों के महापुरुषों ने देश की बहुसंख्यक आबादी को समान शिक्षा, समान अधिकारों के पक्ष में तथा मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ अपने अपने प्रयास जारी किए ,देश मे आजादी के करीब आते आते यह व्यवस्था/विचार, दलित/अम्बेडकरवाद में बदल गया ,इस आंदोलन में सैकड़ों वर्षों पूर्व से पिछड़े वर्ग के तामम समाज सुधारक/महापुरुषों के संघर्ष को दलितवाद के नायक के रूप में पहचान नहीं मिल सकी, देश जब आजाद हुआ तो , दलितों को आबादी के अनुसार देश के संसाधनों एवम संचालन में पूर्ण अधिकार के साथ संविधान में स्थान दिया गया, देश की सवर्णवादी व्यवस्था के नायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी, राष्ट्रपति मा राजेन्द्र प्रसाद जी, पूर्व प्रधान मंत्री मा जवाहर लाल नेहरू जी, गृहमंत्री मा सरदार वल्लभ भाई पटेल जीआदि (यह सभी राष्ट्रीय सत्ता के केन्द्र थे) का योगदान रहा, इन सभी की इच्छा के विपरीत sc ,st को भी समान अधिकार मिलना संभव नहीं थे,वहां भी ओबीसी के साथ विश्वासघात हुआ, वहां ओबीसी को संवैधानिक व्यवस्था में कोई न्याय/अधिकार प्राप्त नहीं हो सकें।
sc st को मिले अधिकारों का पूरा श्येय डॉ भीमराव अंबेडकर साहव को मिला, इसके बाद देश में दलितों की विचारधारा का विस्तार
"अम्बेडकरवाद" के रूप खूब फलफूल रहा है ।
आज इस विचारधारा का विरोध करने की शक्ति किसी भी दल/सत्ता में नहीं है ,यही अम्बेडकरवादी विचारधारा का असली स्वरूपहै।
अम्बेडकरवादियों / मनुवादियों ने "पिछड़े वर्ग" के महापुरुष /समाज सुधारक को खूब प्रयोग किया है ,लेकिन उन्हें नायक के रूप कभी स्वीकार नहीं किया,
यह अम्बेडकरवाद/मनुवादियों की कटु सच्चाई है।
आजादी के बाद वर्णीय व्यवस्था के स्थान को संविधान के दायरे में वर्गीय व्यवस्था ने ले लिया है। (सवर्ण, पिछडा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति) हम "सेवा"इस सच्चाई को जानते हुए भी सहमत हैं कि अगर किसी "वर्ग" विशेष को संगठित एवम संरक्षित रखना हो तो निर्विवाद रूप से उसी वर्ग के महापुरुष को नायक स्वीकार कर ही आगे की सामाजिक न्याय,
सामाजिक परिवर्तन,विकास की कठिन यात्राओं को सफलता पूर्वक तय किया जा सकता है।
अवसरवादी/किराये के नायक बहुत लम्बी यात्रा तय नहीं करा सकते हैं।
आज ओबीसी के अनेकों महापुरुषों के विखंडित प्रयासो से राज्यों में40/50वर्षो एवम राष्ट्रीय स्तर पर30वर्ष पूर्व 3743 पिछड़े वर्ग उपजातियों को पिछड़ा वर्ग/पिछड़ी जाति को संवैधानिक मान्यता मिलने के बाद भी उसकी दुर्दशा के पीछे भी अवसरवादी/किराये के नायकों की राजनैतिक अवसरवादिता के कारण विखंडित/नेतृत्व विहीन वर्ग बन कर रह गया है। ओबीसी ने भिन्न भिन्न अवसरवादी नायकों को अपना नेतृत्व प्रदान किया है, निःसन्देश कुछ सवर्ण (मा राममनोहर लोहिया, मा जयप्रकाश नारायण, पूर्व प्रधानमंत्री मा वी पी सिंह आदि)नायकों ने ओबीसी के लिए न्याय की आवाज, ओबीसी के छोटे छोटे नायकों का सृजन,तथा ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने की व्यवस्था मैं अहम भूमिका निभाई है।लेकिन यह सब के बाद भी यह सब ओबीसी के नायक बनने लायक नहीं, क्योंकि इनकी मूलधारणा में ओबीसी को लाभ पहुचाना था ही नहीं ,ओबीसी (देश की60%आबादी देश का सबसे बड़ा वोट बैंक है)पक्ष में किये गये कृति राजनैतिक मजबूरी/ राजनैतिक अवसरवादिता थीं ।
"मा वी पी सिंह" जी का ओबीसी आरक्षण/मंडल कमीशन रिपोर्ट के कुछ अंश को लागू करने के प्रयास के लिए ओबीसी उनका हमेशा कृतिघ्य रहेगा।
ओबीसी आरक्षण की बात होगी तो निश्चित ही पूर्व प्रधानमंत्री मा वी पी सिंह जी एवम मा शरद यादव जी, मा रामविलास पासवान जी अन्य सभी सहयोगी का नाम सम्मान के साथ हमेशा याद किया जायेगा।
उसी क्रम पूर्व प्रधानमंत्री मा मनमोहन सिंह जी / मा अर्जुन सिंह जी जिन्होंने2006/2007 उच्च शिक्षा तथा प्रधानमंत्री मा नरेंद्र मोदी जी एवम उनके सहयोगियों का 2018में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना तथा2020में केंद्रीय एवम नवोदय विद्यालयो में ओबीसी आरक्षण देने के लिए याद किया जायेगा।
ओबीसी के पक्ष में आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद भी ओबीसी को देश के संशाधनों/संचालन में पूर्ण प्रतिनिधित्व प्राप्त न होना कहीं न कहीं पूर्व में की गयी संवैधानिक व्यवस्था(सवर्णवादी) पर प्रश्नचिन्ह लगाता है?उसके पीछे सिर्फ एक ही कारण ओबीसी की कोई विचारधारा एवम प्रभावशाली नायक का न होना है।
जब देश में संवैधानिक वर्गीय व्यवस्था के आधार पर विचारधाराओं के माध्यम से देश के संसाधनों/संचालन में भागीदारी/अवैद्य रूप कब्जेदारी जारी है,
तो ऐसी स्थिति में पिछड़े वर्ग की विचारधारा सृजन अनिवार्य हो चला है।
पिछले कुछ वर्षों से "सेवा" ने तय किया है ओबीसी "मंडलवाद" की विचारधारा से ही संगठित/संघर्ष शील/विकसित हो सकता है ,जिसके सिर्फ "बी पी मंडल" ही नायक है,उनके आप पास ओबीसी के / अन्य महापुरुषों की श्रृंखला रहेगीं ,उनको पूरा सम्मान दिया जायेगा।मंडलवाद के महानायक बी पी मंडल साहव ने पिछडों वर्ग के पक्ष में निष्पक्षता, भयमुक्त, दृढ़ संकल्प के साथ, बिना किसी राजनैतिक अवसरवादिता के जीवन के अंतिम समय तक देश की बहुसंख्यक आबादी(बिभिन्न साम्प्रदाय/पंथ/जाति/उपजाति विहीन3743उपजातियों को निष्पक्ष रूप से एक शब्द "पिछड़ी जाति"शीर्षक से मंडल कमीशन रिपोर्ट के रूप में महान ग्रंथ की स्थापना की है)तथा उसे लागू कराने का जीवन के अंतिम क्षण तक भरकस प्रयास किया जो हमेशा अनुकरणीय रहेगा।
पिछड़ी जाति/पिछड़े वर्ग के लिए "मंडल कमीशन रिपोर्ट" "गीता रूपी ग्रंथ" के रूप में सर्वदा हम/"सेवा" का मार्गदर्शन करने की साक्षी होगी।
पिछड़े वर्ग की "गीता" "मंडल कमीशन रिपोर्ट"के नायक "बी पी मंडल साहब" ही पिछड़े वर्ग की विचारधारा "मंडलवाद" के महानायक है।"मंडलवाद" में उनकी "समानता" किसी भी अन्य नायक से नहीं की जा सकती है।
निःसन्देश "मंडलवाद" का ध्वजवाहक होने में "सेवा" ही अग्रणी भूमिका में है। "सेवा" अपने निष्पक्ष, दृढ़ संकल्प के साथ मन, वचन, कर्म की पूर्ण सामर्थ्य से ओबीसी की "मंडलवादी" विचारधारा को स्थापित करने में पूर्ण समर्पण के साथ समर्पित रहेगें।
"सेवा" हमेशा पिछड़े वर्ग की "सेवार्थ धर्म" निभाने के लिए तत्पर रहेंगी।
"मंडलवाद" की स्थापना से ही "पिछड़े वर्ग" का कल्याण सम्भव है।
धन्यवाद
जय मंडल जय सेवा
डॉ एम आर यादव रा अध्यक्ष सेवा
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वाह!
भारतीय न्याय/शासन व्यवस्था ?लोगों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करना वर्ण व्यवस्था का मौलिक अधिकार है?
लेकिन लोगों को मौलिक अधिकार प्राप्त करने का मौलिक अधिकार नहीं?
मौलिक अधिकारों के खिलाफ एक ही दिन में याचिका निस्तारित कर निर्णय सुना दिया जाता है, लेकिन संवैधानिक मौलिकता(सवर्ण आरक्षण के पक्ष में किये गए "असंवैधानिक रूप संविधान संशोधन" के खिलाफ "सेवा" की याचिका का निर्णय13अगस्त2019से रिजर्व है)के पक्ष में निर्णय सालों साल रिजर्व रखने की परम्परा कायम है।
।जय हो हमारा देश महान।
रा अध्यक्ष सेवा